जैन समुदाय की आस्था का केंद्र कांगड़ा किला

हर किले का अपना एक रहस्य है और हर किले की अपनी कहानी है। ऐसा ही एक किला हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के कांगड़ा शहर के समीप स्थित है, जो सबसे पुराने किलों में से एक है। यह किला कांगड़ा फोर्ट के नाम से प्रसिद्ध है और देश के सबसे बड़े किलों में 8वें पायदान पर है। यह किला लगभग चार किमी के क्षेत्र को घेरते हुए शिवालिक पहाड़ी पर 463 एकड़ में फैला हुआ है। माझी और बाणगंगा नदियां इस प्राचीन किले के आधार पर संगम करती है...
देश में कई ऐसे पुराने किले हैं, जो आज भी राज घरानों की स्मृतियों को अपने आप में समेटे हुए है। हर किले का अपना एक रहस्य है, हर किले की अपनी कहानी। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के कांगड़ा शहर के समीप स्थित है, जो सबसे पुराने किलों में से एक है। यह किला कांगड़ा फोर्ट के नाम से प्रसिद्ध है और देश के सबसे बड़े किलों में 8वें पायदान पर है। यह किला लगभग चार किमी के क्षेत्र को घेरते हुए शिवालिक पहाड़ी पर 463 एकड़ में फैला हुआ है। यहां से धौलाधार का खूबसूरत नजारा भी देखा जा सकता है। कांगड़ा पहले नगरकोट के नाम से प्रसिद्ध था। छठी शताब्दी में नगरकोट जालंधर अथवा त्रिगर्त राज्य की राजधानी होती थी। राजा संसार चंद के राज्यकाल में यहां कला-कौशल का बोलबाला था। कांगड़ा कलम विश्व विख्यात है, चित्रशैली में भी खास स्थान रखती है। 1905 के भूकंप में कांगड़ा उजड़ गया था। उसके बाद नई आबादी बसाई गई। भूकंप से किले को भी काफी नुकसान पहुंचा था। बाद में किले का जीर्णोद्धार किया गया। हर साल हजारों लोग नगरकोट को देखने आते हैं मगर किले के कई रहस्य आज भी बरकरार हैं। 3,500 साल पहले कटोच वंश के महाराजा सुशर्मा चंद्र ने कांगड़ा का किला बनवाया था।
श्री आदिनाथ महाराज की मूर्ति
किले में श्री 1008 भगवान श्री आदिनाथ महाराज की मूर्ति है। यहां पर हर साल जैन समुदाय के लोग नव्वाणु यात्रा व अनुष्ठान का आयोजन करते हैं। भगवान श्री आदिनाथ महाराज की इस स्थली को जैन समुदाय का तीर्थ रूप बनाया गया है। इसी के साथ किले की धरोहरों को संजोकर रखा गया है। किले के अंदर पुरातत्व विभाग द्वारा संग्रहालय बनाया गया है और किले के बाहर कटोच वंशज द्वारा बनाया गया संग्रहालय है।
दफन हुई गुप्त सुरंग
माना जाता है कि किले के सबसे ऊपरी भाग में गुप्त सुरंग थी। इस सुरंग से महल में रहने वाली रानियां सुबह स्नान के लिए बनेर खड्ड में जाया करती थीं। सुबह पांच बजे रानियां जब स्नान के लिए जाती थीं, तो उस समय घंटी बजाई जाती थी ताकि वहां कोई और न जा सके। किले के पास से ही नंदरूल सहित अन्य गांवों के लिए रास्ता भी था। रानियों के स्नान में खलल न पड़े, इसलिए गुप्त सुरंग बनाई गई थी। अब यह सुरंग इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गई है।
लांघने पड़ते हैं छह दरवाजे
कांगड़ा किले में छह दरवाजे लांघकर पहुंचना पड़ता है। सबसे पहले रणजीत सिंह द्वार है। इसके बाद आहिनी द्वार, आमीरी द्वार, जहांगीर, अंधेरी व दर्शनी द्वार है। दरवाजों को लांघने के बाद मुख्य किले के परिसर में पहुंचते हैं। किले में सबसे ऊंचाई वाली जगह पर पहुंच कर वहां से सामने पहाड़ी पर जयंती माता मंदिर व कांगड़ा शहर का दिलकश नजारा दिखता है। किले में कटोच वंशजों की देवी अंबिका का मंदिर भी है।
खजाने से भरे कुंए
ऐसा कहा जाता है कि हिंदू और अन्य शासक मंदिर में पीठासीन देवता को चढ़ाने के लिए किले में विशाल गहने, सोना और चांदी भेजा करते थे ताकि वह पुण्य अर्जित कर सके। इसलिए, कांगड़ा किले में धन का जमाव होना शुरू हो गया और बाद में किसी के लिए भी इसकी सीमा का पता लगाना मुश्किल हो गया। इतिहास के अनुसार, कश्मीर के राजा श्रेष्ठा 470 ईस्वी में कांगड़ा किले पर हमला करने वाले पहले राजा थे। यहां तक कि महमूद गजनी ने भी 1000 ईस्वी के आसपास किले की संपत्ति की खोज में अपनी सेना को उतारा था। ऐसा माना जाता है कि किले में 21 खजाने के कुएं हैं, जिनमें से प्रत्येक की गहराई चार मीटर गहरी और 2.5 मीटर चौड़ी है। 1890 के दशक में गजनी के शासक आठ कुओं को लूटने में सफल रहे, जबकि ब्रिटिश शासकों ने पांच कुओं को लूट लिया था। ऐसा कहा जाता है कि किले में अभी भी खजाने से भरे आठ और कुएं हैं, जिनका पता लगाना बाकी है। अकबर के नेतृत्व में मुगल सेना ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत में इस किले पर कब्जा करने के 52 असफल प्रयास किए। किला आखिर में ब्रिटिश सैनिकों के हाथों में चला गया।
कई शासकों ने किया किले पर कब्जे
कांगड़ा किले का सबसे प्राचीन अभिलेख 1009 ई. का मिलता है। यह समय मोहम्मद गजनी के आक्रमण का समय था। 1043 में दिल्ली के हिंदू राजाओं ने इस किले पर अधिकार कर लिया और तीन शताब्दियों तक अपने आधिपत्य में रखा। इसके बाद 1337 में मोहम्मद तुगलक व 1365 में फिरोज तुगलक ने किले पर शासन किया। 1563 में धर्मचंद्र के पुत्र माणिक्य चंद्र को नगरकोट किले का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। इसके बाद जयचंद्र ने इस दुर्ग की गद्दी संभाली। 1621 में जहांगीर ने किले को अपने अधिकार में ले लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद कई शासकों के बाद 1743 में नबाब सैफुल्लाह ने इस किले पर अपना अधिकार जमाया। 1789 ईस्वी में यह किला एक बार फिर कटोच वंश के अधिकार में आ गया। राजा संसार चंद द्वितीय ने इस प्राचीन किले को मुगलों से जीत लिया। आपको बता दें कि 1828 ईस्वी तक यह किला कटोच के अधीन ही रहा, लेकिन राजा संसार चंद द्वितीय की मृत्यु के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इस किले पर कब्जा कर लिया। उसके बाद 1846 तक यह सिखों की देखरेख में रहा और बाद में यह अंग्रेजों के अधीन हो गया। 1905 के भूकंप में किले को नुकसान पहुंचा और 1909 में इस किले को राष्ट्र महत्व का स्मारक घोषित किया गया।



